Thursday, 29 September 2016

जिंदगी

जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

चलते चलते गिरना है गिर के भी संभालना है। 
संभल के खुद को तुझे अपनी राह चलना है। 
राह चलते चलते तू खुद का भी सम्भाल कर। । 
जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

राह में चलते चलते अनेको समस्या आएगी 
ओ तुझको तुम्हारी अच्छाइसे चुरायेंगी 
उन बुराईओका तुम डटकर मुकाबला कर। 
जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

न हो कोई साथ तेरे तो कभी न कर फ़िकर। 
तू स्वयं एक सूर्य हो तो फिर तुझे है किससे डर। 
हर एक विजय को तुम स्वमं प्रकाशमान कर। 
जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

न रुकना हे न थमना हे इस बड़े तूफान में। 
दिखा दे तू अपना हुनर इस खामोश जहाँ में। 
हुनर की अपने तू हमेशा ही कर कदर। 
जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

न खुदको तू दूसरोंकी छाओ में कर खड़ा। 
स्वयं के छोटे पैरो पर ही होना है अब बड़ा। 
बड़ा होकर भी कभी पैरो को जमी से निकाल। 
जिंदगी की रहो में तू खुद को भी तलाश कर।

-Sachin 

Thursday, 18 August 2016

चाहूल....

पावसालाही वाटत असेल... 
बरसणाऱ्या धारांमध्ये आपणही भिजावं 
झाडांच्या पानांमध्ये दव बनून लपावं 
पाण्यात सोडलेल्या कागदी नावांमध्ये आपणही बसावं 
लहान मुलांमध्ये लहान बनून रमावं .... 

अंगावर बरसून तिच्या तिला छळावं 
चिखलात मिसळून तिच्या पायावर बसावं... 
छत्रीवर बसून अलगद घसरत खाली पडावं 
रेनकोट वर उभे राहून वाऱ्याशी खेळावं 
अन खेळाता खेळाता अलगत जमिनीवर झोपावं... 

वाऱ्यावर बसून हवेत उडावं 
नदीत मिसळून वाहत वाहत जावं 
वाहता वाहता माशांशी वैर करावं 
शेवटी समुद्रात जाऊन त्यात लीन व्हावं... 

पावसालाहि वाटत असेल..
आपणही प्रियकर बनावं ... 
सुंदर फुलावर मनसोक्त प्रेम करावं ... 
वादळाची तमा न करता सैर व्हावं ... 
पण शेवटी ओलावा बनून या मातच्या कुशीत विसावं.. 

--Sachin